शर्तिया इलाज

शर्तिया इलाज
शर्तिया इलाज

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने शर्तिया इलाज की तारीख तय कर दी है और इस तरह अगला पूरा साल। हिमाचल की स्वास्थ्य सेवाओं को समर्पित रहेगा। यह परीक्षा कठिन नहीं है, लेकिन इसे अमलीजामा पहनाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ होना पड़ेगा। मुख्यमंत्री तमाम मेडिकल कालेजों को विश्व स्तरीय खाके में मजबूत करने का वादा करते हैं और इन्हें एम्स के मानकों में ढालने की वचनबद्धता से मशहूर करना चाहते है। मरीज तो आज भी तेरे दर पे आते हैं, मुश्किल यह कि मर्ज यहां मर्ज बनकर रह जाती। मुश्किल यह जानना नहीं कि कितने मरीज हर दिन हिमाचल से निकल कर बाहरी राज्यों में अपनी सेहत का हवाला देते हैं। यहां चिकित्सा की पूरी पद्धति आगे से आगे धकेल रही है । डिस्पेंसरी से अपना सफर शुरू करके मरीज मेडिकल कालेजों की असमर्थता में कहीं बाहर निकल जाता है। किसी भी अस्पताल के लिए बड़ी मशीनें खरीदी जा सकती हैं, लेकिन मशीन उपचार नहीं करती। उपचार तो नियमित रूप से चिकित्सा सेवाओं की प्रतिष्ठा में निहित है। हुआ यह कि जिस शहर में मेडिकल कालेज बन गए, वहां चिकित्सा की परिक्रमा में निजी अस्पताल बढ़ गए। ये निजी चिकित्सा संस्थान सहारा हैं या सरकारी चिकित्सा संस्थानों को बेसहारा कर रहे हैं। चिकित्सा अब सेवा नहीं एक व्यापक धंधा है, जहां हर मरीज पर शिकारी निगाह है। पूरी चिकित्सा व्यवस्था को सुधारने की जरूरत है। हमारे पास सुविधाएं आज भी कम नहीं और न ही दक्ष एवं विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी है, लेकिन छोटे से छोटे इलाज में भी कसरतें मेडिकल कालेज को करनी पड़ रही हैं। सारे के सारे मेडिकल कालेज एक ही दिशा में भाग रहे हैं। जहां मेडिकल कालेज हैं, वही क्षेत्रीय व जोनल अस्पताल भी खड़े हैं । चिकित्सा विभाग के ढांचे, संस्थानों के वर्गीकरण और भौगोलिक आवश्यकताओं के सांचे को अलग-अलग पैमानों से तरजीह देते हुए इनकी प्रासंगिकता बढ़ानी होगी। इन तमाम मेडिकल कालेजों की स्थापना ने पहले से कार्यरत कई चिकित्सा संस्थानों को बुरी तरह घायल करके एक तरह से अप्रासंगिक बना दिया है। जहां कैडर बड़ा, लेकिन उसका दायरा छोटा हो गया। आधे से ज्यादा चिकित्सा विभाग मेडिकल कालेजों में तशरीफ रखने लगा है, नतीजतन जिला स्तरीय सेवाएं भी बिगड़ गईं। उदाहरण के लिए टांडा मेडिकल कालेज की कीमत धर्मशाला के जोनल अस्पताल को आज भी चुकानी पड़ती है। यहां पंद्रह साल पहले के स्वीकृत पद आज भी अगर मेडिकल कालेज की भेंट हो रहे हैं, तो यह तस्वीर व्यवस्थागत है । अगर टीएमसी की अनावश्यक ओपीडी विभक्त होकर इसके आसपास के सिविल व जोनल अस्पताल में बंट जाए, तो उन्नत उपचार के मायने बदल जाएंगे। आश्चर्य यह कि इमरजेंसी के मायने क्षेत्रीय एवं जोनल अस्पतालों से बिगड़ कर मेडिकल कालेजों का भी नमक हराम कर रहे हैं। सरकार चिकित्सा संस्थानों से यह हिसाब तो ले कि हर दिन हिमाचल से बाहर कितने केस रैफर होते हैं, तो मालूम हो जाएगा कि हमारे बीच संवेदना कितनी बची है। अगर चिकित्सा सेवाओं को बेहतर व सक्षम बनाना है, तो रोग निष्पादन की औसत में सुधार का दैनिक ऑडिट होना चाहिए। हिमाचल में मेडिकल जरूरतें निरंतर बदल रही हैं और इसी वजह से निजी अस्पतालों का नेटवर्क सशक्त हो रहा है।

शर्तिया इलाज
शर्तिया इलाज